अधिष्ठाता

डीन,

इंजीनियरिंग के संकाय

प्रो.एम.के.सुरप्पा

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प्रो.एम.के.सुरप्पा ने बेंगलूर के भारतीय विज्ञान संस्थान से इंजीनियरिंग में (बी ई),( एम एस) और (पीएचडी) की डिग्री सन् १९७३,१९७६और १९८० क्रमशः में प्राप्त की थी। सन् १९८७ से वे भारतीय विज्ञान संस्थान में संकाय के पद पर हैं। सन् २००९ – २०१५ के दौरान वे पंजाब राज्य में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान , के संस्थापक निदेशक थे। इससे पहले वे  २००४ -२००९ के दौरान विज्ञान और प्रौद्योगिकी (केएससीएसटी) के लिए कर्नाटक राज्य परिषद के सचिव थे।

धातु मैट्रिक्स कंपोजिट डिवीजन के(एम एम सीएस)। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उनका लाभदायक योगदान है। सहकर्मी पत्रिकाओं में उनके एक सौ से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं, और चार पेटेंट, धातु मैट्रिक्स कंपोजिट के क्षेत्र में भी हैं।

वे भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी और भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग के फैलो हैं। उन्होंने  वर्ष २०१५ में कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय से साहित्य के डॉक्टर (D.Litt) की मानद उपाधि प्राप्त की। वे वर्ष २०१३ के लिए कर्नाटक राज्य नवाचार परिषद पुरस्कार के प्राप्तकर्ता थे। वर्ष २००६ के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उन्हे कर्नाटक सरकार द्वारा सुवर्णा कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारतीय विज्ञान संस्थान द्वारा वर्ष २००७ के लिए उन्हें विज्ञान और इंजीनियरिंग के अनुसंधान में प्रो रुस्तम चोकसी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें भारत की सामग्री अनुसंधान सोसायटी द्वारा वर्ष २००७ के लिए (एमआरएसआई)-(आईसीएसआई) सुपर कंडक्टीवीटी और सामग्री विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें खान और स्टील्स मंत्रालय (भारत सरकार) से वर्ष १९९८ में धातुशोधन पुरस्कार और वर्ष १९९७  में एमआरएसआई पदक से सम्मानित किया गया था। वह साल २००३ और २००४ के दौरान मैसूर विश्वविद्यालय में सर एम विश्वेश्वरैया चेयर प्रोफेसर भी रह चुके हैं।

डीन, विज्ञान संकाय

प्रो. टी एन गुरू रो

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प्रोफ़ेसर टी एन गुरू रो (ठोस राज्य संरचनात्मक रसायन शास्त्र यूनिट) ने आईआईएससी, बेंगलुरू से अपनी पीएचडी प्राप्त की। उन्होंने अपना पोस्ट डॉक्टरल काम सनी बफैलो, (न्यूयॉर्क) और रोसवेल पार्क मेमोरियल संस्थान, (न्यूयॉर्क)से किया है। उनके अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्र रासायनिक स्फटिक रूप विद्या और सामग्री डिजाइन में है। उन्होंने प्रमुख पत्रिकाओं में अपने  ४५० से अधिक पत्रों को प्रकाशित किया है। वह भारत में दो प्रमुख विज्ञान अकादमियों,- भारतीय विज्ञान अकादमी और राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फैलो हैं। रो, जिन्हें अपने अनुसंधानों के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, उन्हें जे. सी. बोस नेशनल फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया है।

वर्तमान में, वह  “भारतीय विज्ञान संस्थान के जर्नल” में “संपादक” के रूप में कार्य कर रहे हैं।

डीन, स्नातक कार्यक्रम

 

प्रो. अंजलि .ए.करंदे

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अंजलि. ए. करंदे ने सन् १९७७ में अपनी पीएचडी, कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट, (तब बंबई विश्वविद्यालय से संबद्धित) से प्राप्त किया था। उन्होंने दो साल लगकर ट्यूमर जीव विज्ञान विभाग, कारोलिंस्का संस्थान, स्टॉकहोल्म में पोस्ट डॉक्टरेट किया। सन्  १९८७ में, वे बेंगलुरू के भारतीय विज्ञान संस्थान के जीव रसायन विज्ञान के विभाग में एक संकाय सदस्य के रूप में शामिल हो गईं। वर्षों से अंजलि के शोध की रूचि इम्यूनो-ऐंडोक्रिनोलोजी के क्षेत्र पर ही केंद्रित है।

उन्होंने पशु सेल संस्कृति प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए कई बायोटेक कंपनियों के साथ सहयोग किया है।

अंजलि ने ‘महिलाओं छात्रावास वार्डन, पशु घर की अध्यक्ष, छात्र काउंसलर और किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना की समिति के सदस्य के रूप में सेवा की है।

एसोसिएट डीन, स्नातक कार्यक्रम

प्रो बालाजी आर जागीरदार

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बालाजी जागीरदार ने सन् १९८९ में आईआईटी-बंबई से एमएससी और सन् १९९४ में पीएच.डी. की डिग्री कन्सास स्टेट यूनिवर्सिटी, दोनों ही डिग्री। रसायन विज्ञान में प्राप्त की। सन् १९९५ अक्टूबर में भारत लौटने से पहले उन्होंने कोलोराडो विश्वविद्यालय, बोल्डर में एक पोस्ट डॉक्टर के रूप में देढ़ साल  (१९९४-१९९५) तक कार्य किया था। वे आईआईएससी, बेंगलुरू में अकार्बनिक और भौतिक रसायन विज्ञान विभाग के संकाय में शामिल हुए ।

उनकी शोध रूची organometallic यौगिकों के उपयोग से अणुओं की सक्रियण, सजातीय और विजातीय कटैलिसीस, और हाइड्रोजन भंडारण और उत्पादन के लिए सामग्री का उपयोग शामिल हैं। वे भारतीय विज्ञान अकादमी के फैलो है। इसके साथ वे डाल्टन लेनदेन के संपादकीय सलाहकार बोर्ड (आरएससी) पर भी है।

एसोसिएट डीन, स्नातक कार्यक्रम

प्रो पी.एस. अनिल कुमार

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पी एस अनिल कुमार ने पुणे विश्वविद्यालय से १९९८  में भौतिक विज्ञान में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की। सन् २००० तक  वे नैदरलैंड़ के ट्वैन्टे विश्वविद्यालय में एक डच प्रौद्योगिकी फाउंडेशन में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो थे। फिर वह मैक्स प्लैंक  पोस्ट डॉक्टरल् फैलोशिप के तहत् सूक्ष्म संरचनात्मक भौतिकी में जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट, चले गये।  इसके बाद में वे एक अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट रिसर्च फैलो थे।

सन् २००४ में वे भारतीय विज्ञान संस्थान के भौतिकी विभाग में शामिल हो गए। उनकी शोध रूची Spintronics, Magnetic Nano-structures, Magnetotransport in Metallic Multilayers and Oxides, Topological insulators, Magnetic properties of ultra-thin ferromagnets आदि में है।